JKBOSE 10th Class Hindi Solutions chapter – 4 लोकोक्तियाँ
JKBOSE 10th Class Hindi Solutions chapter – 4 लोकोक्तियाँ
Jammu & Kashmir State Board JKBOSE 10th Class Hindi Solutions
लोकोक्तियाँ
लोकोक्ति को ‘कहावत’ भी कहा जाता है। भाषा को प्रभावशाली बनाने के लिए मुहावरों के समान लोकोक्तियों का भी प्रयोग किया जाता है। “लोक में प्रचलित उक्ति को लोकोक्ति कहते हैं। यह एक ऐसा वाक्य होता है जिसे अपने कथन की पुष्टि के परिणामस्वरूप प्रस्तुत किया जाता है।” लोकोक्ति के पीछे मानव समाज का अनुभव अथवा घटना विशेष रहती है। मुहावरे के समान इसका भी विशेष अर्थ ग्रहण किया जाता है जैसे-“हाथ कंगन को आरसी क्या” इसका अर्थ होगा “प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।” यहां लोक-जीवन का अनुभव प्रकट हो रहा है – यदि हाथ में कंगन पहना हो तो उसे देखने के लिए शीशे की आवश्यकता नहीं होती।
लोकोक्ति और मुहावरे में अन्तर
मुहावरा एक वाक्यांश है जिसका क्रिया के रूप में प्रयोग होता है। लोकोक्ति एक स्वतन्त्र वाक्य है जिसमें एक पूरा भाव छिपा रहता है। इसको किसी कथन पर घटाया जाता है जबकि मुहावरे का प्रयोग वाक्यों के बीच ही होता है।
लोकोक्तियाँ
अक्ल बड़ी या भैंस (शरीर बड़ा होने की अपेक्षा बुद्धि बड़ी होनी अच्छी है ) – गणेश के स्थूल शरीर से घबराने की ज़रूरत नहीं। वाद-विवाद में बुद्धि की आवश्यकता है न कि शरीर की । अक्ल बड़ी या भैंस वाली कहावत आप जानते ही हैं।
अटका बनिया देय उधार (काबू आने पर ही लोग काम करते हैं) – मैंने जब उसको साइकल देने से इन्कार कर दिया तो उसने झट से मेरे पच्चास रुपये दे दिए। ठीक भी हैं अटका बनिया देय उधार ।
अति परिचय ते होत है अरुचि अनादर भाय (बहुत परिचय रोचकता तथा मान में हानि पहुंचाता है)—वे महात्मा जो वर्ष में एक बार आते थे तो उनका बहुत मान होता था। अब उन्होंने एक मास में दो-दो चक्कर लगाने प्रारम्भ कर दिए हैं। अतः उनका विशेष मान नहीं होता। इसी को कहते हैं अति परिचय ते होत है अरुचि अनादर भाय ।
अधजल गगरी छलकत जाए (कम ज्ञान अथवा थोड़े धन वाला व्यक्ति दिखावा अधिक करता है)—महेश ने केवल आठवीं कक्षा पास की हुई है, लेकिन बातें ऐसी करेगा जैसे बी० ए० पास हो । इसी को कहते हैं अधजल गगरी छलकत जाए।
अन्त भले का भला (अच्छे को अन्त में अच्छा फल मिलता है) – मैं तो सच्चाई और ईमानदारी का पथिक हूं। मेरा ‘अन्त भले का भला’ में दृढ़ विश्वास है ।
अन्धा क्या चाहे दो आँखें (मनचाही वस्तु प्राप्त होने पर और क्या चाहिए ) – जब मैंने उसे चल चित्र देखने के लिए चलने को कहा तो वह प्रसन्नता से झूम उठा और कहने लगा – अन्धा क्या चाहे दो आँखें ।
अन्धा क्या जाने बसंत की बहार (असमर्थ व्यक्ति गुणों को नहीं पहचान सकता) – उस मूर्ख को गीता का उपदेश देना व्यर्थ है। उस पर तो ‘अन्धा क्या जाने बसंत की बहार’ वाली कहावत चरितार्थ होती है ।
अन्धा बांटे रेवड़ियां फिर-फिर अपनों को देय (पक्षपाती व्यक्ति बार-बार अपनों को ही लाभ पहुंचाता है) – मन्त्री महोदय अपने रिश्तेदारों को ही लाभ पहुंचा रहे हैं। इसी को कहते हैं अन्धा बांटे रेवड़ियां फिर-फिर अपने को देय ।
अन्धी पीसे कुता चाटे (नासमझ अथवा सीधे-सादे व्यक्ति के परिश्रम का लाभू दूसरे व्यक्ति उठाते हैं) – दिनेश जो कुछ कमाता है, उसके मित्र उड़ा कर ले जाते हैं। यहां तो अन्धी पीसे कुत्ता चाटे वाली बात हो रही है।
अन्धों में काना राजा (मूर्खों में थोड़े ज्ञान वाला भी बड़ा मान लिया जाता है) – हमारे गाँव में किशोरी लाल ही थोड़ा सा पढ़ा लिखा व्यक्ति है। सभी इसकी इज्जत करते हैं। इसी को कहते हैं- अन्धों में काना राजा।
अन्धे की गैया राम रखवैया (असहाय का भगवान्, रक्षक होता है ) – वह बुढ़िया हमेशा अपनी कुटिया खाली छोड़कर चली जाती है। पूछने पर उत्तर देती है— अन्धे की गैया राम रखवैया।
अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग ( भिन्न-भिन्न मत होना) – इस सभा में कोई भी निर्णय नहीं हो सकता। सबकी अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग है ।
अपना लाल गंवाय के दर-दर मांगे भीख (अपनी अच्छी वस्तु खोकर दूसरों के आगे हाथ फैलाना ) – सेठ जी ने थोड़ी सी बात पर अपने अनुभवी मुनीम को हटा दिया। अब दूसरों की तलाश में भटक रहे हैं। इसी को कहते हैंअपना लाल गंवाय के दर-दर मांगे भीख ।
अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गईं खेत ( हानि हो जाने पर बाद में पछताने से क्या लाभ) – पहले लाख समझाने पर भी तुमने परिश्रम नहीं किया। अब असफलता पर आंसू बहाना व्यर्थ है। क्या तुम नहीं जानते – अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गईं खेत ।
आम के आम गुठलियों के दाम (दोहरा लाभ) – आजकल तो अखबार की रद्दी भी अच्छे भाव पर बिक जाती है । यह तो आम के आम गुठलियों के दाम वाली बात है ।
आ बैल मुझे मार ( जान-बूझकर अकारण विपत्ति मोल लेना) – मैंने उसे समझाने की कोशिश की तो वह मेरे ही गले पड़ गया। मेरे लिए तो आ बैल मुझे मार वाली बात हो गई ।
आगे कुआं पीछे खाई (दोनों और मुसीबत) – शिकारी जंगल में रास्ता भटक गए। आगे जाते हैं तो शेर का डर है, पीछे मुड़ते हैं तो रास्ता नहीं सूझता। उनके लिए तो आगे कुआं पीछे खाई वाली बात हो गई है।
आंख ओझल पहाड़ ओझल (जो आंखों से दूर हो जाता है, वह बहुत दूर हो जाता है) – मैं अपने छोटे भाई को पढ़ने के लिए बाहर नहीं भेजना चाहता । सम्भव है वहां वह कुसंग में पड़ जाए। क्योंकि मैं जानता हूं – आंख ओझल पहाड़ ओझल ।
आंख के अन्धे गांठ के पूरे (नासमझ किन्तु पैसे वाले ) – महेश तो ऐसे मित्रों की तलाश में रहता है जो आंख के अन्धे गांठ के पूरे हों।
आंख के अन्धे नाम नयनसुख (नाम अच्छा किन्तु काम उल्टा ) – उसका नाम तो सर्वप्रिय है लेकिन बात करने पर लड़ने को दौड़ता है। उस पर तो ‘आंख के अन्धे नाम नयनसुख’ वाली कहावत चरितार्थ होती है।
अकेला चना भाड़ को नहीं फोड़ सकता (एक व्यक्ति कोई बड़ा कार्य नहीं कर सकता ) – तुम अकेले उस संस्था का कार्य नहीं सम्भाल सकते। क्या तुम नहीं जानते कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ।
ईश्वर की माया कहीं धूप नहीं छाया (परमात्मा ने किसी को धनवान् बनाया है और किसी को निर्धन) – मुम्बई जैसे बड़े नगरों में एक ओर तो धनवान् हैं जो महलों में रहते हैं, दूसरी ओर निर्धन हैं जिनके पास कुटिया भी नहीं। इसी को कहते हैं ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया ।
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (अपराधी पूछने वाले को ही दोषी ठहराए ) – एक तो मेरे रुपये उठाकर ले गए, दूसरा पूछने पर मुझे ही डांट रहे हो । इसी को कहते हैं – उल्टा चोर कोतवाल को डांटे ।
उल्टे बांस बरेली को (विपरीत कार्य ) – बनारस का आम तो वैसे ही प्रसिद्ध है और तुम यहां से घटिया किस्म का आम भेज रहे हो। यह तो उल्टे बांस बरेली को वाली बात हो रही है ।
उस दाता से सूम भला जो जल्दी देय जवाब ( टालमटोल की अपेक्षा तुरन्त जवाब देना अच्छा है) — अगर-मगर करने की अपेक्षा उसे साफ़ जवाब दे दो । प्रसिद्ध भी है – उस दाता से सूम भला जो जल्दी देय जवाब ।
ऊधो का लेना न माधो का देना (किसी से लेन देन न होने पर व्यक्ति निश्चिन्त रहना है ) – वह निष्पक्ष होने के कारण सदा मस्त रहता है। उसे न ऊधो का लेना न माधो का देना है।
ऊंट के मुंह में जीरा (अधिक खाने वाले को थोड़ी सी चीज़ मिलना) – उस पेटू के लिए तो दो कचौरियां ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
ऊंची दुकान फीका पकवान (दिखावा अधिक वास्तविकता कम) – उस दुकान की मिठाइयों की बड़ी प्रशंसा सुन रखी थी लेकिन खाने में विशेष स्वादिष्ट नहीं । इसी को कहते हैं ऊंची दुकान फीका पकवान ।
एक अनार सौ बीमार (वस्तु कम, चाहने वाले अधिक) — यदि किसी कार्यालय में एक स्थान रिक्त होती है तो उसकी पूर्ति के लिए सैंकड़ों प्रार्थना पत्र आते हैं। इसी को कहते हैं एक अनार सौ बीमार ।
एक हाथ से ताली नहीं बजती (एक ही पक्ष झगड़े का कारण नहीं हो सकता) – मैं नहीं मानता कि इस झगड़े में तुम्हारा दोष नहीं । एक हाथ से ताली नहीं बजती ।
एक ही थैली के चट्टे-बट्टे (एक-जैसे स्वभाव वाले) – उनमें से किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।
एक म्यान में दो तलवारें नहीं समा सकतीं (दो शक्तिशाली व्यक्ति एक ही स्थान पर नहीं रह सकते ) – शेर सिंह ने मान सिंह को ललकारते हुए कहा कि इस किले में या तो तू रहेगा या मैं । एक म्यान में दो तलवारें नहीं समा सकतीं।
एक पंथ दो काज ( एक ही प्रयत्न में दो लाभ उठाना ) – स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करने से एक तो देश के उत्पादन में वृद्धि होती है, दूसरा देश भक्ति का भाव भी प्रकट होता है । यह तो एक पंथ दो काज वाली बात है।
एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है (एक के दोष के कारण सब दोषी बन जाते हैं) – नरेश के रुपए तो किसी एक ही विद्यार्थी ने उठाए हैं, पर प्राध्यापक को सब पर सन्देह हो रहा है। इसी को कहते हैं- एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है ।
एक तो करेला दूसरा नीम चढ़ा ( एक दोष तो पहले होना, साथ ही एक और लग जाना) – उसे तो पहले ही शराब पीने की बुरी आदत थी, ऊपर से उसे दोस्त भी वैसे ही मिल गए हैं। उस पर तो ‘एक तो करेला दूसरा नीम चढ़ा’ वाली लोकोक्ति चरितार्थ हो रही है ।
ओछे की प्रीति बालू की भीत (तंग दिल व्यक्ति की मित्रता कच्ची होती है ) – उससे धोखा खाने पर तुम्हें होश आया है। मैंने तो पहले ही बता दिया था – ओछे की प्रीति बालू की भीत।
ओखली में सिर दिया तो मूसलों का क्या डर (कठिन काम हाथ में लेने पर विपत्ति से नहीं डरना चाहिए ) – सरकार के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज़ उठाई है तो जेल तो जाना ही पड़ेगा । ओखली में सिर दिया तो मूसलों का क्या डर ।
कंगाली में आटा गीला (गरीबी में और हानि होना) – निर्धनता में उसकी नौकरी छूट जाना कंगाली में आटा गीला के समान है।
कहां राजा भोज कहां गंगू तेली ( एक उत्तम और दूसरा तुच्छ, दोनों में कोई तुलंना नहीं) – उस साधारण गायिका की तुलना लता मंगेशकर से करना उचित नहीं । कहां राजा भोज कहां गंगू तेली ।
कांठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है (छल-कपट से एक ही बार काम लिया जा सकता है) – मैं एक बार तुस में ठगा जा चूका हूं, अब तुम्हारी चिकनी चुपड़ी बातों में नहीं आ सकता । क्या तुम नहीं जानते कि काठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है।
कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा ( वे मेल अथवा भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को इकट्ठा करके कोई गुट बनाना ) – दिनेश ने इधर-उधर के लोगों को इकट्ठा करके जो समाज सेवी संस्था बनाई है, वह अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकती। इस पर तो कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा वाली लोकोक्ति चरितार्थ होती है ।
कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर ( समय-समय पर दो व्यक्ति अथवा दो वस्तुएं एक-दूसरे की सहायक बनती हैं)—महेश ने हमेशा तुम्हारी सहायता की है। अब वह संकट में है, तुम्हें उसकी मदद करनी चाहिए। संसार का यही तरीका है – कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर ।
कड़ाई से निकला चूल्हे में गिरा (एक विपत्ति से निकलना, दूसरी में पड़ जाना ) – हरीश बड़ी मुश्किल से चोरी के अपराध से मुक्त हुआ था, अब रिश्वत के अपराध में फिर पकड़ा गया है। इसको कहते हैं कड़ाही से निकला चूल्हे में गिरा।
कोयला की दलाली में मुँह काला (कुसंगति अथवा दोषपूर्ण काम में लगने से बदनामी होती है ) – वे दोनों ही दुष्ट हैं। उनके झगड़े में दखल देना कोयले की दलाली में मुंह काला वाली बात होगी ।
कोयला होय न ऊजला सौ मन साबुन धोय (बहुत प्रयत्न करने पर भी दोषी अपना स्वभाव नहीं बदलता) – रावण जब समझाने पर भी नहीं समझा तो सभी जान गए – कोयला होय न ऊजला सौ मन साबुन धोय |
का वर्षा जब कृषि सुखाने (हानि हो जाने पर सहायता प्राप्त होना व्यर्थ है)-रोगी की मृत्यु हो चुकी है और लोग उसके इलाज के लिए चन्दा इकट्ठा कर रहे हैं। यहां तो का वर्षा जब कृषि सुखाने वाली बात हो रही है।
कुत्ते को घी हजम नहीं होता (ओच्छा व्यक्ति धन अथवा पद पाकर घमंड करता है) – जब से वह दुष्ट रामलीला कमेटी का प्रधान बना है, किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता । किसी ने ठीक कहा है – कुत्ते को घी हज़म नहीं होता।
कोठी वाला रोवे छप्पर वाला सोवे ( धनी चिन्ताग्रस्त रहता है जबकि निर्धन निश्चिन्त रहता है) – मुझे धन इकट्ठा करने का लालच नहीं । मैंने इस संसार में रह कर यह अनुभव कर लिया है – कोठी वाला रोवे छप्पर वाला सोवे ।
कौवा चला हंस की चाल (बुरे व्यक्ति द्वारा अच्छा बनने का दिखावा करना) – वह अब पुजारी बनने का ढोंग रच रहा है। उस पर तो कौवा चला हंस की चाल वाली लोकोक्ति चरितार्थ होती है ।
खूंटे के बल बछड़ा नाचे (किसी की शह से ही कोई अकड़ दिखाता है ) – उसके चाचा जी पुलिस अधिकारी हैं। इसीलिए वह सबसे झगड़ा मोल लेता है। यहां तो खूंटे के बल बछड़ा नाचे वाली बात हो रही है ।
खग ही जाने खग की भाषा (एक ही स्वभाव अथवा जाति के लोग एक-दूसरे की बात समझते हैं ) – रवीन्द्र की बातें सुरेन्द्र ही समझ सकता है। कहा भी है – खग ही जाने खग की भाषा ।
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है ( एक शरारती का असर दूसरे पर भी पड़ता है ) – एक कॉलेज के छात्र हड़ताल करें तो दूसरे कॉलेज के छात्र भी बिना किसी कारण के हड़ताल के लिए तैयार हो जाते हैं। इसी को कहते हैं— खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है ।
खरी मजूरी चोखा काम ( सरल काम में किसी झंझट के बिना आमदनी होना ) – उसने ग़ैर-सरकारी नौकरी छोड़कर नौकरी कर ली है। उसके लिए तो अब खरी मजूरी चोखा काम वाली बात है।
खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे (लज्जित अथवा अपमानित होने पर इधर-उधर रोष प्रकट करना ) – बड़े अधिकारी ने छोटे अधिकारी को ताड़ना दी तो छोटा अधिकारी अपने नीचे काम करने वाले कर्मचारियों पर बरस पड़ा। इसी को कहते हैं- खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे ।
खोदा पहाड़ निकली चुहिया ( परिश्रम अधिक फल बहुत कम ) – हम चार मील चलकर जनता पुस्तकालय में पहुंचे कि वहां कुछ पठनीय सामग्री मिलेगी पर वहां कुछ भी नहीं था। तभी सबने कहा – खोदा पहाड़ निकली चुहिया।
गोद में बैठकर आंख में उंगली (आश्रयदाता अथवा सहायक के साथ ही बुरा व्यवहार करना ) – तुम राजा साहब के मकान में रहते हो और उन्हीं का विरोध कर रहे हो । यह तो गोद में बैठकर आंख में उंगली वाली बात हो रही है ।
गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है (बड़े के साथ रहने से छोटे को भी हानि उठानी पड़ती है ) — भ्रष्टाचार के अपराध में रामलाल के साथ ही उसका निर्दोष नौकर भी पकड़ा गया। किसी ने ठीक ही कहा है— गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है ।
गरीब की जोरू सबकी भाभी (गरीब अथवा शक्तिहीन को सभी दबाते हैं ) – उस सीधे-सादे निर्धन चपरासी को सभी मनचाहा मज़ाक करते हैं। सच है, गरीब की जोरू सबकी भाभी |
गंगा गए गंगाराम जमुना गए जमुनादास (जिधर गए उधर के विचारों के हो गए ) – कुछ लोग जो कल तक तो कांग्रेस में थे लेकिन आज जनता पार्टी का पलड़ा भारी देखकर उसमें शामिल हो रहे हैं। उन लोगों के लिए ही तो कहा गया है— गंगा गए गंगाराम जमुना गए जमुनादास ।
गधा खेत खाए जुलाहा मारा जाए (दुष्ट अपराध करता है भले को दण्ड मिलता है ) – शरारत तो मदन ने की थी पर पकड़ा गया निर्दोष देसराज । इसी को कहते हैं – गधा खेत गाए जुलाहा मारा जाए।
घर की मुर्गी दाल बराबर ( सहज प्राप्त वस्तु को लोग महत्त्व नहीं देते ) – हम स्वदेशी ठोस वस्तुओं की अपेक्षा बाहरी चमक-दमक वाली विदेशी वस्तुओं को अधिक महत्त्व देते हैं। सच है, घर की मुर्गी दाल बराबर।
घर का भेदी लंका ढाए (फूट विनाश का कारण बनती है ) – यदि उसने तुम्हारी पोल खोल दी तो कहीं के न रहोगे। तुम अच्छी तरह समझते हो – घर का भेदी लंका ढाए ।
घर का जोगी जोगड़ा बाहर का जोगी सिद्ध (घर के समर्थ व्यक्ति की उपेक्षा कर बाहर के कम योग्य व्यक्ति को महत्त्व दिया जाता है) – उसकी माताजी प्राध्यापिका है, लेकिन वह उनसे सहायता न लेकर एक सामान्य स्तर के अध्यापक से पढ़ता है। यह तो घर का जोगी जोगड़ा बाहर का जोगी सिद्ध वाली बात है।
घर आए नाग न पूजहिं बांबी पूजन जाएं (समय पर सुलभ काम न करके बाद में कठिन काम करना ) – घर पर बूढे पिताजी की सेवा तो करते नहीं और स्वयं सेवक बन कर वैष्णव देवी की यात्रा पर जा रहे हैं। इसी को कहते हैंघर आए नाग न पूजहिं बांबी पूजन जाएं।
चोर की दाढ़ी में तिनका (अपराधी स्वयं डरकर अपना भेद प्रकट कर देता है) – चोर के विषय में पूछताछ चल रही थी कि सहसा एक व्यक्ति बोल उठा-“मैंने चोरी नहीं की” यह सुनकर सभी कहने लगे- चोर की दाढ़ी में तिनका।
चाँद को भी ग्रहण लगता है (उच्च अथवा महान् व्यक्ति को भी अपयश मिलता है) – तुम्हें इस झूठे आरोप से घबराना नहीं चाहिए। क्या तुम नहीं जानते – चाँद को भी ग्रहण लगता है।
चार दिन की चाँदनी फिर अन्धेरी रात (सुख थोड़े दिन ही रहता है ) – ऐश्वर्य एवं यौवन पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। ये तो चार दिन की चाँदनी फिर अन्धेरी रात है।
चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए (कंजूस व्यक्ति शारीरिक कष्ट उठा लेता है लेकिन पैसा खर्च नहीं करता ) – सेठ जी चार मील रोज़ पैदल चलकर अपनी दुकान पर जाते हैं पर रिक्शा नहीं करते। उन पर तो चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए वाली कहावत चरितार्थ होती है।
छोटा मुंह बड़ी बात (योग्यता अथवा आयु से बढ़कर बात करना) – मैंने सेठ जी को कहा- अपने नौकर को समझा लो, यह छोटा मुंह बड़ी बात करता है।
जल में रहकर मगर से बैर (आश्रयदाता से दुश्मनी करना) – अपने मालिक से झगड़ा बढ़ाना जल में रहकर मगर से बैर करने वाली बात होती है।
जाके पांव न फटी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई (जिसने स्वयं कष्ट न भोगा हो, वह दूसरों के कष्ट नहीं जान सकता) – सेठ जी ने कभी निर्धनता नहीं देखी, इसलिए वे निर्धनों के दुःखों का अनुमान नहीं कर सकते। कहा भी हैजाके पांव न फटी त्रिवाई सो क्या जाने पीर पराई।
जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि (कवि की कल्पना बहुत दूर तक पहुंच जाती है) – बिहारी ने अपने दोहों में जिस सूक्ष्म कल्पना का प्रयोग किया है, उसे देखकर कहना पड़ता है – जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि ।
जाको राखे साइयां मार न सकिहै कोय (जिसे भगवान् बचाना चाहे उसे कोई नहीं मार सकता ) – पर्वत की चोटी से गिरकर भी बालक बाल-बाल बच गया। ईश्वर के इस चमत्कार को देखकर सब कह उठे – जाको राखे साइयां मार न सकिहै कोय।
जितने मुंह उतनी बातें (सबके भिन्न-भिन्न विचार) – कांग्रेस में फूट क्यों पड़ी – इस विषय में जितने मुँह उतनी बातें हैं।
जो गरजते हैं वे बरसते नहीं (डींग मारने वाले कुछ करते नहीं) – भुट्टो की धमकियां इस बात का प्रमाण हैं कि जो गरजते हैं वे बरसते नहीं।
जैसी बड़े बयार पीठ तब तैसी दीजै (समय और परिस्थिति के अनुसार बदलना चाहिए ) – जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए आधुनिकता अपनाना ज़रूरी है। तभी तो कहा है – जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै ।
जिन ढूंढ़ा तिन पाइयां गहरे पानी पैठि (जो गम्भीरता से प्रयत्न करते हैं उन्हें सफलता मिलती है ) – ईश्वर को प्राप्त करना सरल कार्य नहीं उसके लिए कठोर साधना की आवश्यकता है। तभी तो कबीर ने कहा है- जिन ढूंढ़ा तिन पाइयां गहरे पानी पैठि।
जिसकी लाठी उसकी भैंस (राज्य या वस्तु पर शक्तिशाली का ही अधिकारी होता है, शक्तिशाली की ही विजय होती है)-सेठजी ने अपने नौकर पर चोरी का झूठा इल्ज़ाम लगाकर उसे जेल भिजवा दिया। इसको कहते हैं- (जिसकी लाठी उसकी भैंस) ।
जस दूल्ह तस बनी बारात (जो जैसा है उसके साथी भी वैसे ही होते हैं) – भला वह कौन-सा अच्छा है जो तुम उसके साथियों को बुरा कह रहे हो। प्रसिद्ध भी है- जस दूल्ह तस बनी बारात ।
झूठ के पांव कहां (झूठा व्यक्ति अपनी बात पर स्थिर नहीं रहता) – पहले तो उसने अपने को निर्दोष साबित करने के लिए उल्टी- सीधी युक्तियां दीं पर दाल न गलने पर अपना अपराध स्वीकार कर लिया। इसको कहते हैं झूठ के पांव कहां।
ठंडा लोहा गर्म लोहे को काट देता है (शान्त व्यक्ति क्रुद्ध व्यक्ति को हरा देता है) – चुनाव के दिनों में वह मेरे ऊपर कीचड़ उछालता रहा किन्तु मैं शान्त बना रहा। परिणामस्वरूप मैं जीत गया, वह हार गया। मैं जानता था – ठंडा लोहा गर्म लोहे को काट देता है।
ढाक के तीन पात (एक-सी हालत में रहना) – जितना मरजी कमा लो ढाक के तीन पात वाली कहावत ही चरितार्थ होती है।
तबेले की बला बन्दर के सिर (दोष किसी का सज़ा किसी को ) – चोर तो चोरी करके भाग गया पर पकड़ा गया बेचारा चौकीदार । इसी को कहते हैं तबेले की बला बन्दर के सिर ।
तू डार – डार मैं पात-पात (यदि तुम चालाक हो तो मैं तुमसे भी चालाक हूं) – राकेश ने श्याम को धोखा देने की कोशिश की पर स्वयं ही उससे धोखा खा गया। इस प्रकार श्याम ने सिद्ध कर दिया – तू डार – डार मैं पात-पात ।
तेते पांव पसारिये जेती लाम्बी सौर (अपनी आय अथवा सामर्थ्य के अनुसार खर्च अथवा काम करना चाहिए ) -आय से अधिक खर्च करना आर्थिक संकट का कारण । सदैव याद रखो – तेते पांव पसारिये जाते लाम्बी सौर ।
थोथा चना बाजे घना ( थोड़े गुण अथवा धन वाला व्यक्ति घमण्ड अधिक करता है ) – थोड़ी सी पूंजी के स्वामी बनकर इतना इतरा रहे हो। इसी को कहते हैं थोथा चना बाजे घना |
दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम (दुविधा में रहने से दोनों तरफ से हानि होती है ) – वह नौकरी भी करना चाहता था और व्यापार भी । परिणामस्वरूप दोनों से हाथ धो बैठा। उस पर तो दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम वाली कहावत चरितार्थ होती है ।
दादा बड़ा ने भैया सबसे बड़ा रुपैया (रुपये वाले का ही मान होता है ) – उसने अपने दादा की उपेक्षा करके सेठ प्यारेलाल को गौरव प्रदान किया। इसी को कहते हैं – दादा बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया।
दूध का जला छाछ फूंक-फूंक कर पीता है (एक बार हानि उठाने पर मनुष्य हानि न पहुंचाने वाले से भी डरता ) – उसने संस्था का प्रबन्धक बनकर अनुभव किया कि इस कार्य में कुछ नहीं रखा । यही कारण है कि अब वह किसी संस्था का सदस्य भी नहीं बनना चाहता, इसी को कहते हैं – दूध का जला छाछ को फूंक-फूंक कर पीता है।
दूर के ढोल सुहावने (दूर से वस्तुएं अच्छी लगती हैं लेकिन निकट जाने पर कटु अनुभव होता है)—हमने फतेहपुर सीकरी के विषय में बहुत कुछ सुन रखा था लेकिन वहां दर्शनीय कुछ भी नहीं था । इसी को कहते हैं-दूर के ढोल सुहावने होते हैं ।
देखें ऊंट किस करवट बैठता है (देखें क्या परिणाम निकलता है) – परीक्षा – पत्र तो अच्छे हो गए हैं। देखें, ऊंट किस करवट बैठता है।
धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का (दो तरफ टांग फसाने वाला व्यक्ति किसी जगह का नहीं रहता)—वह न तो अपने काम में रुचि दिखाता है और न ही नौकरी की तरफ ध्यान देता है। उस पर तो धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का वाली लोकोक्ति चरितार्थ करती है ।
न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी (असम्भव शर्त पूरी न होने पर काम भी नहीं होता) – जब नीलम को नाचने के लिए कहा गया तो वह कहने लगी कि जब तक मेरे लिए नया मंच नहीं बनता तब तक मैं नहीं नाचूंगी। तभी शीला ने कहा यह तो न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी वाली बात हो गई ।
नया नौ दिन पुराना सौ दिन (नए की अपेक्षा पुराना स्थिर होता है) – तुम अपने पुराने विश्वास-पात्र मित्र को छोड़कर नए के पीछे मत भागो । क्या तुम्हें मालूम नहीं – नया नौ दिन पुराना सौ दिन ।
नौ नकद न तेरह उधार (उधार के अधिक की अपेक्षा नकद का थोड़ा अच्छा रहता है) – जो व्यापारी नौ नकद न तेरह उधार वाली नीति पर चलते हैं, वे कभी आर्थिक संकट का सामना नहीं करते ।
नाम बड़े दर्शन छोटे (प्रसिद्धि अधिक किन्तु तत्त्व कुछ भी नहीं) – उस विद्यालय की प्रसिद्धि तो बहुत सुन रखी थी पर पढ़ाई कुछ भी नहीं। इसी को कहते हैं- नाम बड़े दर्शन छोटे।
नाच न जाने आंगन टेढ़ा (गुण न होने पर बहाने बनाना) – अरे तुम्हें सिलाई करनी तो आती नहीं और नुक्स निकाल रही हो कपड़े में । इसी को कहते हैं-नाच न जाने आंगन टेढ़ा।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ( दूसरों को उपदेश देने वाले तो बहुत हैं पर स्वयं उस पर अमल करने वाले कम हैं) – सदाचारी व्यक्तियों की संख्या बहुत कम है, पर उपदेश कुशल बहुतेरे हैं।
पराधीन सपनेहु सुख नाहीं (दूसरे के अधीन रहने में ज़रा भी सुख नहीं) – लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने भाषणों द्वारा बार-बार भारतवासियों को समझाया कि पराधीन सपनेहु सुख नाहीं ।
बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी (नाश या पराजय अवश्य होती है) – वह डाकू सरकार की नज़रों से बच नहीं सकता। आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ।
बगल में छुरी मुंह में राम-राम (ऊपर से सज्जन भीतर से दुष्ट ) – उसकी मधुर बातों के चक्कर में न फंसना। उस पर तो बगल में छुरी मुंह में राम-राम वाली कहावत चरितार्थ होती है।
बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख (मांगने से इच्छा पूरी नहीं होती न मागने से बहुत कुछ मिल जाता है) – साधुओं ने सोचा भीख मांगने से कुछ न मिलेगा। यज्ञ करने पर लोग अपने आप धन देंगे क्योंकि प्रसिद्ध भी है – बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख ।
बिल्ली के भागों छींका टूटा (अचानक काम बन जाना) – उस दिन लड़कों की पढ़ाई में रुचि नहीं थी। अचानक अध्यापक को किसी कार्यवश छुट्टी लेनी पड़ी। लड़के उछल पड़े । बिल्ली के भागों छींका टूटा वाली कहावत चरितार्थ हो गई।
भागते चोर की लंगोटी सही ( पूरी हानि होते समय जो कुछ बच जाए वही अच्छा है) – हमारा नौकर पांच सौ रुपए लेकर भाग गया पर उसका कुछ सामान हमारे पास पड़ा है। हमने सोचा – भागते चोर की लंगोटी सही ।
मन के हारे हार है मन के जीते-जीत (मन की कमज़ोरी अथवा दृढ़ता से ही असफलता या सफलता मिलती है)इस संसार में विजय प्राप्त करने के लिए मन को बलवान बनाने की आवश्यकता है क्योंकि मन के हारे हार है मन के जीते जीत।
मन चंगा तो कठौती में गंगा (हृदय की पवित्रता हो तो घर में ही तीर्थ यात्रा का लाभ मिल जाता है ) – जिसका मन पवित्र है, उसे घर पर ही पुण्य लाभ हो जाता है – मन चंगा तो कठौती में गंगा ।
मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की (किसी काम को सुधारने की कोशिश करना पर उसका बिगड़ते जाना ) – मैंने पूरी कोशिश की कि वह उसे भुला दे पर मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की । अब तो वह पागलों की सी बातें करने लगा है।
मान न मान मैं तेरा मेहमान (जबरदस्ती मेहमान बनना) – उसने हमारे यहां डेरा ही डाल रखा है। उस पर दो मान न मान मैं तेरा मेहमान वाली लोकोक्ति चरितार्थ होती है ।
यह मुंह और मसूर की दाल (अयोग्य होने पर विशेष वस्तु की इच्छा रखना) – उसकी बड़ी बड़ी बातें सुनकर सब ने कहा- यह मुंह और मसूर की दाल ।
रस्सी जल गई पर ऐंठन न गया (शक्ति नष्ट हो जाने पर भी अकड़ बने रहना) – पाकिस्तान के नेता हार कर भी डींग हांकते हैं। इसी को कहते हैं- रस्सी जल गई पर ऐंठन न गया ।
लकड़ी के बल बन्दर नाचे (मूर्ख डर दिखाने से काम करता है) – हमारा नौकर प्रत्येक काम में लापरवाही दिखाने लगा था। एक दिन मैंने कहा यदि काम नहीं करोगे तो नौकरी से निकाल दूंगा। तब से वह ठीक ढंग से काम करने लग गया है। ठीक है—लकड़ी के बल बन्दर नाचे ।
लातों के भूत बातों से नहीं मानते (दुष्ट व्यक्ति कहने से नहीं दण्ड देने से वश में आते हैं) – जब तक उसकी पिटाई नहीं करोगे, वह सच नहीं बोलेगा, क्योंकि लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
वा सोने के जारिये जासों टूटे कान (उस कीमती चीज़ को छोड़ देना ही अच्छा है जिससे लाभ की बजाय हानि अथवा कष्ट हो) – महंगाई के इस युग में तुम्हारे लिए कार रखना सम्भव नहीं। अतः उसे बेच देना ही उपयुक्त है। कहा भी है- – वा सोने को जारिये जासों टूटे कान ।
समरथ को नाहीं दोष गुसाईं (धनवान् अधिकारी अथवा शक्तिशाली कुछ भी करे उसे दोष नहीं लगता) – प्रधान जी संस्था के किसी भी नियम का पालन नहीं करते, पर उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। ठीक है- समरथ को नहीं दोष गुसाईं ।
सहज पके सो मीठा होए ( धीरे-धीरे होने वाला काम पक्का तथा लाभकारी होता है) – कोई भी व्यापारी एकदम नहीं चमक उठता। इसलिए घबराओ नहीं, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। प्रसिद्ध भी है – सहज पके सो मीठा होए।
सांप मरे न लाठी टूटे (हानि भी न हो और दुष्ट भी नष्ट हो जाए) – उस गुंडे को मुंह लगाना अच्छी बात नहीं। गुप्त रूप से पुलिस को सूचित कर दो । सांप मरे न लाठी टूटे वाली बात ठीक रहेगी।
सावन हरे न भादों सूखे ( सदा एक सी दशा रहनी ) – नौकरी वाले व्यक्ति की स्थिति प्रायः एक सी रहती है। उसके लिए तो सावन हरे न भादों सूखे वाली बात है।
सौ सुनार की एक लुहार `की (कमज़ोर व्यक्ति की सौ चोटों की अपेक्षा शक्तिशाली की एक ही चोट अधिक काम कर जाती है) – वह कन्हैया को रोज़ गालियां देता था, एक दिन कन्हैया ने पकड़ कर उसकी खूब पिटाई की। यह देखकर सभी ने कहा- सौ सुनार की एक लुहार की ।
हंसा थे सो उड़ गए कागा भए दीवान ( गुणवान तो चले गए अब गुणहीन नेता बन गए हैं ) – मुरारी लाल जैसे नि:स्वार्थी प्रधान अब इस संस्था को नहीं मिल सकते । अब तो यही कहना चाहिए – हंसा थे सो उड़ गए कागा भए दीवान।
हथेली पर सरसों नहीं जमती (समय पाकर होने वाला काम शीघ्र नहीं किया जा सकता ) – इस विषय पर सोच-विचार कर रहा हूं। अभी से कोई राय देना उचित नहीं। हथेली पर सरसों नहीं जमती ।
हाथ कंगन को आरसी क्या (प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती ) – पुलिस अधिकारी ने कहा कि मुझे किसी से पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं । उसके अपराध को साबित करने के लिए मेरे पास पहले से ही प्रमाण है। हाथ कंगन को आरसी क्या ।
हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और (करने और कहने में अन्तर) – नेता लोग चुनाव से पहले तो कुछ कहते हैं पर चुनाव के बाद उनका व्यवहार कुछ और ही हो जाता है। उन पर तो हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और वाली कहावत लागू होती है।
होनहार बिरवान के होत चीकने पात (महान् बनने वाले व्यक्ति के लक्षण उसके बचपन में ही प्रकट हो जाते हैं) — श्री लाल बहादुर शास्त्री के साहसपूर्ण बचपन को देखकर ही अनुमान लगाया जाता था कि वह भविष्य में महान् बनेगा। तभी तो कहा है – होनहार बिरवान के होत चीकने पात।