JKBOSE 9th Class Hindi Solutions chapter – 17 धूप बत्ती : बुझी जली —कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’
JKBOSE 9th Class Hindi Solutions chapter – 17 धूप बत्ती : बुझी जली —कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’
Jammu & Kashmir State Board JKBOSE 9th Class Hindi Solutions
J&K State Board class 9 Hindi Solutions
लेखक-परिचय
जीवन परिचय— श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ आधुनिक युग के प्रमुख गद्य लेखक हैं। उनकी लेखन कला में सजीवता के दर्शन होते हैं। उनकी रचनाओं को पढ़ने वाला पाठक अपने आपको परिस्थिति के बीच में पाता है। उनका जन्म सन् 1906 में सहारनपुर जिले के देववन्द ग्राम में हुआ था। प्रारम्भ से ही प्रभाकर जी की रुचि सामाजिक कार्यों में थी जिसके परिणामस्वरूप वे राष्ट्रीय आन्दोलनों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। आपकी रुचि समाज निर्माण के कार्यों में ही अधिक है। आपके व्यक्तित्व में अद्भुत समन्वय है। आपका आदर्श जीवन प्रेरक शक्ति के समान है। आपके सम्पर्क में जो भी आता है, उसे एक उचित मार्गदर्शन प्राप्त होता है। आप सद्वृत्तियों एवं सामाजिक तथा राष्ट्रीय भावों को जगाने वाले लेखक हैं।
पत्रकारिता में आपकी रुचि विशेष है। विविध पत्रों के माध्यम से ही आपने जन-जीवन को अपनी विचारधारा एवं आदर्शों से अवगत कराया है।
विकास, ज्ञानोदय, विश्वतान तथा नया जीवन जैसे लोकप्रिय पत्रों का सम्पादन तथा संचालन किया है। आप इसी क्षेत्र में रहकर अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं।
कृतित्व— श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने गद्य की अनेक विधाओं का प्रवर्त्तन, पोषण किया है। कथा, संस्मरण, रिपोर्ताज, रेखाचित्र जैसी विधाओं के क्षेत्र में प्रभाकर जी अग्रणी रहे हैं। उनकी उल्लेखनीय रचनाएं अधोलिखित हैं—
रेखाचित्र— नई पीढ़ी नए विचार, ज़िन्दगी मुस्काई, माटी हो गई सोना ।
निबन्ध संग्रह—बाजे पायलिया के घुंघरू ।
लघु कथा संग्रह— आकाश के तारे- धरती के फूल ।
संस्मरणात्मक रेखाचित्र— दीप जले, शंख बजे।
रिपोर्ताज— क्षण बोले, कण मुस्काए, महके आंगन चहके द्वार । प्रभाकर जी की रचनाओं पर उनके व्यक्तितता की स्पष्ट छाप है। इसीलिए उनकी कृतियां भावात्मक एवं सरस हैं। व्यावहारिक पक्ष की प्रबलता ने उनकी रचनाओं को प्रभावशाली बना दिया है। वे सीधा उपदेश न देकर परिस्थिति की आवश्यकतानुसार सदाचरण की प्रेरणा देते हैं। व्यंग्यात्मक शैली के कारण उनकी रचनाओं में रोचकता का समावेश है।
मिश्र जी की भाषा प्रायः व्यावहारिक है। सम्पादक के आदर्श का निर्वाह करते हुए वे ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जो जन-जीवन के लिए सुबोध एवं सहज है।
पाठ का सार
‘धूप बत्ती : बुझी जली’ शीर्षक निबन्ध के रचयिता श्री कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं। इस में उन्होंने नम्रता का महत्त्व प्रतिपादित किया है। एक दिन लेखक ने धूप बत्ती जलाई तो वह पूरी न जली। अगले दिन लेखक ने तीन बार दियासलाई जलाकर ज्यों-की-त्यों खड़ी धूप बत्ती जलाने की कोशिश की पर उसे सफलता न मिली। चौथी बार लेखक ने धूप बत्ती को तिरछा, झुकाकर जलाया तो वह तुरन्त जल उठी। यह देखकर लेखक को नम्रता के महत्त्व का ज्ञान हुआ। अकड़ से कुछ भी प्राप्त नहीं होता। तभी तो यह कहावत प्रसिद्ध है ‘बेटा बनकर सबने खाया बाप बनकर किसी ने नहीं।’
संस्कृत में श्लोक है जिसमें विनय को सुख की कुंजी बताया गया है- विद्या से विनय, विनय से पात्रता (पाने की योग्यता), पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है। लोक-जीवन में भी नम्रता का महत्त्व देखने को मिलता है। एक परिवार में देवर ने अपनी कानी भाभी से कहा- ‘कानी भाभी पानी दे।’ ‘भाभी को भला यह कैसे अच्छा लगता ।’ उसने व्यंग्य भरे शब्दों में कहा – ‘मुंह तो धोकर आओ।’ उसी देवर ने जब नम्रतापूर्वक कहा – ‘रानी भाभी पानी दे’ यह सुनकर भाभी स्नेह से भर कर कहने लगी- ‘पानी तो तुम्हारे कुत्तों को भी पिलाऊं तुम तो दूध पियो ।’ इससे भी यह स्पष्ट होता है कि नम्रता द्वारा ही कुछ `प्राप्त किया जा सकता है।
लेखक ने अपनी नम्रता के बल पर खान के कठोर व्यवहार पर विजय प्राप्त कर ली थी। उन्हें मालवीय जी के ये शब्द याद थे –’देश के हर द्वार पर एक दाता खड़ा है अपनी खुली थैली लिए, पर कमी उन हाथों की हैं, जिनमें वह भेंद दे सके।’ मालवीय जी के इस कथन का परीक्षण खान पर किया गया जो सर्वथा ठीक सिद्ध हुआ। बम्बई मेल में अत्यधिक भीड़ थी। डिब्बों में तिल धरने की जगह न थी। केवल एक डिब्बा खाली था पर खान की आकृति को देखकर कोई अन्दर जाने का साहस नहीं कर सकता था। लेखक खान के डिब्बे के सामने खड़ा रहा। लेखक ने नम्र व्यवहार से खान प्रभावित हो गया और उसने लेखक को स्थान दे दिया। इतना ही नहीं लेखक ने अपने निरन्तर बढ़ते नम्र व्यवहार से अन्य स्टेशनों पर खड़े कुछ यात्रियों को भी खान के डिब्बे में प्रवेश पाने का अवसर प्रदान किया। इस प्रकार लेखक खान का मित्र बन कर उससे जुदा हुआ।
कठिन शब्दों के अर्थ
संस्मरणात्मक = संस्मरण वाला। दृष्टांत = उदाहरण। पात्रता = योग्यता। अनुभवजन्य = अनुभव से। नम्रता = विनम्रता । वाणी = आवाज़। अहंकार = घमण्ड। स्पर्श = छूना। सुगमता से = आसानी से पुलकित = रोमांचित, आनंदित।
गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
1. मुझे वह सिर जली ऐसी लगी कि जैसे कोई मनुष्य हो, थोड़े बहुत ज्ञान से जिसका बौद्धिक जागरण तो हो गया हो, पर मानसिक विकास न हुआ हो और वह उस बौद्धिक जागरण को अपना सम्पूर्ण विकास मानकर अहंकार में उफनता फिरता हो।
प्रसंग— प्रस्तुत गद्यांश कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित निबन्ध ‘धूप बत्ती : बुझी जली’ से उद्धृत है। लेखक ने इस निबन्ध में यह संदेश दिया है कि विनम्र होकर हम सब का हृदय जीत सकते हैं। लेखक अपनी कोठरी में क्या देखता है कि कल सुबह की धूप बत्ती जो पूरी तरह जली नहीं थी, कुछ जलकर बुझ गई थी, वह अब भी ज्यों-की-त्यों खड़ी है। उसे देखकर लेखक ने मन पर जो प्रतिक्रिया हुई, उसी का यहां वर्णन हुआ है।
व्याख्या— लेखक का कथन है कि यह धूप बत्ती उस व्यक्ति के समान है जिसकी थोड़े- बहुत ज्ञान से बुद्धि तो जागृत हो गई पर उसके मन का विकास अभी नहीं हुआ है और वह उस बौद्धिक जागरण को ही अपने व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास मान कर अहंकार से भर गया है। लेखक के कहने का यह अभिप्राय है जिस व्यक्ति की थोड़े ज्ञान अर्जन से बुद्धि तो विकसित हो गई है परन्तु मन संकीर्णता के बन्धनों में जकड़ा हुआ है, उसका अहंकार जागृत हो जाता है और वह अपने ज्ञान का प्रदर्शन करता घूमता है।
विशेष— मानसिक विकास के अभाव में बौद्धिक विकास संकीर्णता का प्रतीक है। भाषा सहज, मुहावरों से युक्त तथा शैली आत्मकथात्मक है।
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर—
प्रश्न (क) इस पाठ और लेखक का नाम क्या है ?
(ख) लेखक ने सिर जली किसे कहा है ?
(ग) यहां बौद्धिक जागरण से क्या तात्पर्य है ?
(घ) लेखक ने किसके मानसिक विकास न होने की बात कही है ?
उत्तर— (क) पाठ- धूपबत्ती : बुझी जली, लेखक – कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर ।
(ख) लेखक ने धूपबत्ती को सिर जली कहा है।
(ग) धूपबत्ती ऊपर से तो जल गई थी- इसे ही लेखक ने धूपबत्ती का बौद्धिक जागरण माना है।
(घ) लेखक ने धूपबत्ती के मानसिक विकास न होने की बात कही है क्योंकि वह ऊपर से जलकर फिर बुझ गई थी ।
2. किसी से कुछ लेना हो तो झुकना आवश्यक है। साफ-साफ यों कि पाने के लिए नम्र होना आवश्यक है। लोकोक्ति है—’बेटा बनकर सबने खाया है बाप बनकर किसी ने नहीं।’
प्रसंग— प्रस्तुत अवतरण कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित लेख ‘धूप बत्ती : बुझी जली’ से अवतरित किया गया है। इस में नम्रता के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। नम्रता से ही हम सब का हृदय जीत सकते हैं। लेखक ने अनुभव किया है कि धूप बत्ती खड़ी – होने की स्थिति में दियासलाई की ज्वाला को ग्रहण करने में असमर्थ रहती है और तिरछी धूप बत्ती उसे सुगमता से ग्रहण कर लेती है। इससे वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि जीवन में कुछ पाने के लिए झुकना आवश्यक है।
व्याख्या— प्रभाकर जी इसी सन्दर्भ में लिखते हैं कि किसी से कुछ प्राप्त करने के लिए झुकना आवश्यक है। अकड़बाज बनकर किसी से कुछ प्राप्ति की आशा निरर्थक है। इस बात को और भी अधिक स्पष्ट रूप में यों कहा जा सकता है कि किसी प्रकार की उपलब्धि के लिए विनम्रता आवश्यक है। एक कहावत भी है कि बेटा बनकर सबने खाया, बाप बनकर किसी ने नहीं। इसका यह अभिप्राय है कि विनम्र बनकर आप दूसरों से कुछ ग्रहण कर सकते हैं, अकड़ से नहीं।
विशेष— लोकोक्ति में बेटा विनम्रता का तथा बाप अकड़बाज का प्रतीक का सुन्दर प्रयोग किया गया है। भाषा सहज, सरल तथा शैली लाक्षणिक है।
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर—
प्रश्न– (क) लेने के लिए झुकना क्यों अवश्यक है ?
(ख) बेटा बनना किसका प्रतीक है ?
(ग) ‘बाप बनकर किसी ने नहीं खाया’ का अर्थ क्या है?
उत्तर— (क) जब तक हम विनम्र नहीं होंगे, हमें कुछ नहीं मिलेगा, इसलिए लेने के लिए झुकना पड़ता है।
(ख) बेटा बनना विनम्रता का प्रतीक है।
(ग) इसका अर्थ है कि अकड़कर कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।
3. एक बार काशी जाकर पूज्य मदन मोहन मालवीय जी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बातों ही बातों में उन्होंने कहा था- “देश के हर द्वार पर एक दाता खड़ा है अपनी खुली थैली लिए, पर कमी उन हाथों की है; जिनमें वह अपनी भेंट दे सकें।” इस तरह देने वाले से बढ़कर लेने वाले की पात्रता है ।
प्रसंग— प्रस्तुत पंक्तियां श्री कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित लेख ‘ धूप बत्ती : बुझी जली’ से उद्धृत की गई हैं। मालवीय जी ने उक्त कथन में नम्रता का महत्त्व बताया है।
व्याख्या— काशी में एक बार लेखक की पूज्य मालवीय जी से भेंट हुई तब उन्होंने लेखक से ये शब्द कहे थे। मालवीय जी के शब्दों का अभिप्राय है कि दाता तो हर जगह मिल सकते हैं, परन्तु ऐसे व्यक्तियों को कमी है जो उनसे दान प्राप्त करने की योग्यता रखते हैं अर्थात् यदि मांगने वाले के व्यवहार में नम्रता और उसकी वाणी में मिठास हो तो कोई भी उसकी मदद करने को तैयार हो जाएगा। यदि किसी से हम किसी प्रकार की सहायता मांगते हैं तो यह हम पर भी निर्भर है कि हम उसका दिल किस हद तक जीत पाते हैं। यदि हमारा मधुर व्यवहार उसे प्रभावित कर पाया तो इसमें सन्देह नहीं कि यह हमारी सहायता आवश्यक करेगा। भाव यह है कि देने वाले से बढ़कर लेने वाले में गुणों की अधिक आवश्यकता है।
विशेष— दान सुपात्र को देना चाहिए। भाषा सरल, सहज तथा शैली विचार प्रधान है।
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर—
प्रश्न (क) लेखक को काशी में किनके दर्शन हुए ?
(ख) ‘देश के हर द्वार पर दाता खड़ा है’ से क्या तात्पर्य है ?
(ग) किन हाथों की और क्यों कमी है ?
उत्तर— (क) लेखक ने काशी में पण्डित मदन मोहन मालवीय के दर्शन किए।
(ख) इस कथन का तात्पर्य है कि देश में दान देने वालों की कमी नहीं है।
(ग) दान लेने वालों की कमी है क्योंकि दान केवल सुपात्र को देना चाहिए, हर किसी को नहीं।
अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
बोध
1. लेखक ने रेल यात्री के रूप में पठान का हृदय कैसे जीता ?
उत्तर— लेखक ने रेल यात्री के रूप में पठान का हृदय विनम्र व्यवहार से जीता। उसने पठान की वीरता तथा उदारता की प्रशंसा की। विनम्रता एवं प्रशंसा पूर्वक व्यवहार ने पठान की कठोरता को कोमलता में बदल दिया।
2. ‘जब वह चौथी को छूते ही जल उठी, तो झुकी हुई थी ‘ – इस कथन में कौन-सा भाव छिपा है ?
उत्तर— इस कथन में यह भाव छिपा है कि नम्र बन जाने पर ही कुछ प्राप्त किया जा सकता है, अकड़ने पर कुछ नहीं मिलता। मिलता है तो अपमान और तिरस्कार ही मिलता है।
3. मदनमोहन मालवीय जी के निम्नलिखित कथन को लेखक के अनुभव के आधार पर स्पष्ट कीजिए—
” देश के हर द्वार पर एक दाता खड़ा है, अपनी खुली थैली लिए, पर कमी उन हाथों की है जिनमें, वह अपनी भेंट दे दे।”
उत्तर— उक्त कथन का प्रयोग मालवीय जी ने लेखक से बातें करते हुए किया था । इस कथन का आशय यह है कि दाता तो हर जगह विद्यमान है लेकिन उसके दान को प्राप्त करने की योग्यता रखने वालों की कमी है। नम्रतापूर्ण व्यवहार से कठोर से कठोर व्यक्ति से भी कुछ प्राप्त किया जा सकता है। मालवीय जी के कथन का सफल परीक्षण स्वयं लेखक ने बम्बई मेल के एक डिब्बे में बैठे खान की कठोरता पर विजय प्राप्त कर किया। खान किसी को भी अपने डिब्बे में बैठने नहीं देता था। वह कानून से भी नहीं डरता था लेकिन लेखक ने अपने सद्व्यवहार से स्वयं ही नहीं अपितु अन्य स्टेशनों पर खड़े कुछ यात्रियों को भी उसी डिब्बे में स्थान दिलाया।
4. लेखक को मालवीय जी के कथन ( संदेश) का परीक्षण करने में किस भाँति सफलता मिली ?
उत्तर— इस प्रश्न के उत्तर के लिए प्रश्न 3 का उत्तर पढ़ें।
5. “कानी भाभी, पानी पिला” और “रानी भाभी, पानी पिला ” – इन दोनों कथनों से लेखक किस बात की ओर संकेत करना चाहता है ?
उत्तर— उक्त दोनों कथनों के प्रयोग के माध्यम से लेखक ने स्वभाव की कटुता तथा मधुरता के अंतर को स्पष्ट किया है। नम्रता एवं सम्मानपूर्वक व्यवहार से मनुष्य अपनी मनचाही वस्तु पा लेता है जबकि कठोर एवं अहंकार पूर्ण व्यवहार से उपेक्षा एवं अपमान का सामना करना पड़ता है।
6. पठान के स्वभाव का अपने शब्दों में संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर— पठान एक बहादुर व्यक्ति है पर हृदय से कठोर है। वह दूसरों की सुख-सुविधा की चिन्ता नहीं करता। वह कानून की भी परवाह नहीं करता। वह यात्रियों को नीचे फेंक देने की धमकी देता है। इन सब दोषों के होते भी पठान में मानवता का गुण शेष है। लेखक का नम्र व्यवहार उसके मानवीय गुणों को प्रकट करने में सफल होता है।
7. निम्नलिखित शब्दों के अर्थ स्पष्ट करते हुए इन्हें अपने वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए—
पात्रता, मर्मस्पर्शी, अपेक्षा, संस्मरण, पुलकित, वृत्ति, बौद्धिक जागरण, मानसिक विकास।
उत्तर— पात्रता — योग्यता । सेना की तकनीकी शाखा में प्रवेश की पात्रता किसी तकनीकी – विषय में स्नातक होना है।
मर्मस्पर्शी— मर्म को प्रभावित करना । रेल दुर्घटना का दृश्य अत्यंत मर्मस्पर्शी था।
अपेक्षा— आशा, चाह । विनम्र बनकर ही हम किसी से कुछ पाने की अपेक्षा कर सकते हैं।
संस्मरण— स्मरण, यादें । नेताजी ने अपनी विदेश यात्रा के संस्मरण सुनाए ।
पुलकित— रोमांचित, आनंदित। बालक की किलकारियों ने माँ को पुलकित कर दिया ।
वृत्ति— पेशा । भिक्षा वृत्ति अत्यंत निदंनीय कार्य है।
बौद्धिक जागरण— समझ आना। देश की उन्नति के लिए बौद्धिक जागरण अत्यंत आवश्यक है।
मानसिक विकास— उदार होना । अंधविश्वासों से मुक्त होने के लिए हमारा मानसिक विकास होना आवश्यक है।
भाषा अध्ययन—
1. यह वाक्य ध्यान से पढ़ें—
उस ने मुझे दो बढ़िया सेब दिए ।
मूल वाक्य है—
उसने मुझे सेब दिए ।
‘दो बढ़िया’ ‘सेब का विशेषण है।
2. मूल वाक्य में पदों का क्रम इस प्रकार है : उस ने (कर्ता) मुझे (कर्म) सेब (कर्म) दिए (क्रिया) स्पष्ट है कि यहां क्रिया पद में दो कर्म हैं अतः इसे द्विकर्मक क्रिया कहेंगे। मुख्य कर्म ‘सेब’ हैं, क्योंकि इस के बिना वाक्य का अर्थ अपूर्ण रहता है । ‘मुझे’ गौण कर्म है । द्विकर्मक क्रियाओं के साथ गौण कर्म पहले आता है और मुख्य कर्म बाद में।
अन्य उदाहरण—
(क) अध्यापक ने बच्चे को पुरस्कार दिया ।
(ख) तुम भूखे को रोटी और प्यासे को पानी दो। द्विकर्मक क्रिया वाले दो वाक्य बनाएं।
उत्तर— (क) श्याम ने राधा को बाँसुरी सुनाई।
(ख) रजत ने रुचि को पुस्तक दी ।
3. पठान ने कहा—
(क) तुम बैठाएगा।
(ख) हम फेंकेगा।
पठान की बोली में कर्ता (तुम, हम) तथा क्रिया में मेल (अन्विति) नहीं है। शुद्ध रूप यह होगा—
(क) तुम बैठाओगे ।
(ख) हम फेंकेगे।
यहां ‘बैठाना” क्रिया- पद की भविष्यकाल की सम्पूर्ण रूपावली दी जा रही है—
| एकवचन | बहुवचन | |
| उत्तम पुरुष | मैं बैठाऊँगा । | हम बैठाएँगे । |
| मध्यम पुरुष | तू बैठाएगा। | तुम बैठाओगे । |
| अन्य पुरुष | वह बैठाएगा | वे बैठाएंगे। |
निम्नलिखित धातुओं की भविष्यत काल की रूपावली लिखिए— कर, खेल ।
उत्तर—
कर
| एकवचन | बहुवचन | |
| उत्तम पुरुष | मैं करूंगा। | हम करेंगे । |
| मध्यम पुरुष | तू करेगा। | तुम करोगे। |
| अन्य पुरुष | वह करेगा । | वे करेंगे । |
खेल
| एकवचन | बहुवचन | |
| उत्तम पुरुष | मैं खेलूँगा । | हम खेलेंगे। |
| मध्यम पुरुष | तू खेलेगा। | तुम खेलोगे । |
| अन्य पुरुष | वह खेलेगा। | वे खेलेंगे । |
परीक्षोपयोगी अन्य प्रश्नोचर
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर है,
प्रश्न 1. बुझी धूपबत्ती किसकी द्योतक है ?
उत्तर— अभिमान की ।
प्रश्न 2. जली धूपबत्ती किसकी प्रतीक है ?
उत्तर— उदारता की।
प्रश्न 3. ‘बेटा बन कर खाया’ से तात्पर्य क्या बनना है ?
उत्तर— विनम्र ।
प्रश्न 4. किससे हम सब का हृदय जीत सकते हैं ?
उत्तर— नम्रता से ।
प्रश्न 5. कौन-सी भाभी देवर को पानी भी नहीं पिलाती ?
उत्तर— कानी भाभी।
प्रश्न 6. धूपबत्ती कैसे जली ?
उत्तर— झुकाने पर ।
प्रश्न 7. सुख की कुंजी क्या है ?
उत्तर— विनय ।
प्रश्न 8. मेल ट्रेन के भरे डिब्बे में चढ़ना किसकी दाढ़ से गोश्त निकालना था ?
उत्तर— शेर की।
प्रश्न 9. अठारह आदमियों के डिब्बे में खान समेत कितने लोग थे ?
उत्तर— चार ।
प्रश्न 10. खान जब सो कर उठा तो रेल के डिब्बे में कितने लोग थे ?
उत्तर— बारह ।