JKBOSE 9th Class Hindi Grammar Chapter 10 क्रिया
JKBOSE 9th Class Hindi Grammar Chapter 10 क्रिया
Jammu & Kashmir State Board JKBOSE 9th Class Hindi Grammar
J&K State Board class 9 Hindi Grammar
परिभाषा— जिस शब्द के द्वारा किसी काम का करना पाया जाये अथवा किसी वस्तु के लिए विधान किया जाए, उसे ‘क्रिया’ कहा जाता है।
उदाहरण— राम खाता है यहां ‘खाता है’ क्रिया है।
सामान्य क्रिया— क्रिया के जिस रूप से काल-विशेष का बोध न हो और उसके अन्त में ‘ना’ का प्रयोग हो, उसे क्रिया का सामान्य रूप कहा जाता है। जैसे- आना, जाना, सोना, खाना।
धातु— क्रिया के सामान्य रूप से यदि ‘ना’ हटा दिया जाए तो बचे हुए रूप को धातु कहा जाता है; जैसे-आ, जा, सो खा ।
क्रियाओं के प्रकार
अर्थ की दृष्टि से क्रियाएं दो प्रकार की होती हैं—
1. सकर्मक क्रिया 2. अकर्मक क्रिया ।
1. सकर्मक क्रिया— जिस क्रिया के व्यापार का फल कर्म पर पड़ता है, उसे ‘सकर्मक’ कहा जाता है जैसे- ‘राम खाता है’, यहां क्रिया तो राम कर रहा है, पर उसका फल ‘आम’ पर पड़ रहा है, अतः ‘खाता है’ सकर्मक क्रिया है।
2. अकर्मक क्रिया— जिस क्रिया के फल और व्यापार दोनों कर्ता में रहते हैं, उसे ‘अकर्मक’ कहा जाता है। जैसे-‘राम सोता है’, यहां ‘सोना’ क्रिया का फल और आपार दोनों कर्ता ‘राम’ पर पड़ रहे हैं, अत: ‘सोना’ अकर्मक क्रिया है।
संयुक्त क्रियाएं— जब कई क्रियाएं मिलकर मुख्य क्रिया के अर्थ को पुष्ट करती हैं तो वे सहायक क्रियाएं कहलाती हैं। ऐसी मिली-जुली एक से अधिक क्रियाओं को संयुक्त क्रिया कहा जाता है; जैसे-ले जाना, दे जाना, भर देना, पढ़ डालना, गिर पड़ना, यहां ‘आना’, ‘जाना’ आदि मुख्य क्रियाएं हैं; उनके साथ ‘ले’, ‘दे’ आदि सहायक क्रियाएं लगी
प्रेरणार्थक क्रियाएं— जब कर्त्ता स्वयं काम न करके किसी दूसरे को उसे करने की आज्ञा देता है तो वहां ‘प्रेरणार्थक क्रिया प्रयुक्त होती है, जैसे—
राम ने खाना खाया (सकर्मक)
राम ने खाना खिलवाया (प्रेरणार्थक)
नीचे उदाहरण के लिए इस प्रकार की क्रियाओं के रूप दिए जाते हैं :—
| अकर्मक | सकर्मक | प्रेरणार्थक |
| उठना | उठाना | उठवाना |
| करना | कराना | करवाना |
| गिरना | गिराना | गिरवाना |
| घूमना | घुमाना | घुमवाना |
| चलना | चलाना | चलवाना |
क्रियाओं के रूप परिवर्तन
संज्ञाओं के समान क्रियाओं के भी लिंग, वचन, काल, वाच्य और पुरुष के कारण रूप बदल जाते हैं जैसे-जाती है, जाता है, जाते हैं, गया, जाता हूं, जाऊंगा आदि ।
वाच्य
किसी बात को कथन करने की शैली का नाम ‘वाच्य’ है। इसके तीन भेद किये गये हैं—
1. जिसमें ‘कर्ता’ प्रधान होता है उसे ‘कर्तृवाच्य’ कहा जाता है।
2. जिसमें ‘कर्म’ प्रधान होता है, उसे ‘कर्मवाच्य’ कहा जाता है।
3. जिसमें ‘भाव’ प्रधान होता है उसे ‘भाववाच्य’ कहा जाता है।
उदाहरण—
1. कर्तृवाच्य में क्रिया में लिंग, वचन, आदि कर्ता के समान होते हैं जैसे- राम पुस्तक पढ़ता है, सीता गाना गाती है, बच्चे गेंद खेलते हैं। इस वाच्य में सकर्मक और अकर्मक दोनों प्रकार की क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी कर्ता के साथ ‘ने’ चिह्न नहीं लगाया जाता।
2. कर्मवाच्य में क्रिया के लिंग, वचन, आदि कर्म के अनुसार होते हैं जैसे- कृष्ण से कंस मारा गया, रमेश से पुस्तक लिखी जाती है। इसमें केवल ‘सकर्मक’ क्रियाओं का प्रयोग होता है।
3. भाववाच्य में क्रिया की प्रधानता रहती है, इसमें क्रिया सदा एक वचन, पुल्लिंग और अन्य पुरुष में आती है। इसका प्रयोग प्रायः निषेधार्थ में होता है जैसे – चला नहीं जाता, पिया नहीं जाता, खाया नहीं जाता। —
वाच्य – परिवर्तन
कर्तृवाच्य में कर्मवाच्य अथवा भाववाच्य बनाने को ‘वाच्य-परिवर्तन’ कहते हैं; उदाहरण नीचे दिए गए हैं—
| कर्तृवाच्य | कर्मवाच्य |
| मैं रोटी खाता हूं | मुझ से रोटी खाई जाती है |
| मैंने रोटी खाई है | मुझ से रोटी खाई गई है |
| मैंने रोटी खाई | मुझ से रोटी खाई गई |
| मैं रोटी खाऊंगा | मुझ से रोटी खाई जायेगी |
| क्या मैं रोटी खाऊंगा ? | क्या मुझ से रोटी खाई जायेगी ? |
कर्तृवाच्य में कर्ता और कर्म अपने शुद्ध रूप में प्रयुक्त होते हैं, पर कर्मवाच्य में कर्ता के साथ करण कारक और चिह्न ‘से’ लगाया जाता है, और कर्म में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है। उसके साथ चिह्न नहीं लगाया जाता । इस वाच्य परिवर्तन को याद रखने के लिए संस्कृत का यह श्लोक याद करना चाहिए—
यदा कर्ता प्रथमान्तः कर्मणि द्वितीया तदा ।
यदा कर्ता तृतीयान्तः कर्मणि प्रथमा तदा ॥
प्रथमान्त कर्ता के साथ द्वितीयान्त कर्म आता है और तृतीयान्त कर्ता के साथ प्रथमान्त कर्म आता है। ऊपर के उदाहरणों से यह नियम स्पष्ट हो रहा है।
कर्तृवाच्य से भाववाच्य बनाना
| कर्तृवाच्य | भाववाच्य |
| श्याम जागता है | श्याम से जागा जाता है |
| राम नहीं सोता है | राम से सोया नही जाता |
भाववाच्य बनाने के लिए कर्ता को करण कारक में बदल दो। अकर्मक धातु के सामान्य नूतकाल के रूप बनाकर अन्त में ‘जा’ धातु का प्रथम पुरुष, पुल्लिंग और एक वचन का रूप लगा दो।
काल
जिससे क्रिया के होने या करने का समय पाया जाता है, उसे काल कहते हैं। इसके तीन भेद हैं—
1. भूतकाल
2. वर्तमान काल
3. भविष्य काल
1. भूतकाल
क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय का बोध होता है, उसे भूतकाल कहते हैं। इसके 6 भेद होते हैं—
1. सामान्य भूत, 2. आसन्न भूत, 3. पूर्ण भूत, 4. अपूर्ण भूत, 5. संदिग्ध भूत, 6. हेतुहेतुमद भूत।
1. सामान्य भूत— इसमें किसी विशेष भूतकाल का बोध नहीं होता; जैसे- मैंने पानी पिया, राम ने रोटी खाई।
2. आसन्न भूत— इसमें क्रिया निकट भूतकाल में समाप्त होती है; जैसे- मेरा मित्र दिल्ली गया है।
3. पूर्ण भूत— इसमें क्रिया को पूर्ण हुए बहुत समय व्यतीत हुआ पाया जाता है; जैसेने कंस को मारा था।
4. अपूर्ण भूत— इसमें क्रिया का भूतकाल में होना परन्तु समाप्त न होना पाया जाता है; जैसे- कल आकाश में वायुयान उड़ रहा था।
5. संदिग्ध भूत— इसमें भूतकाल में काम होने में संदेह पाया जाता है; जैसे श्याम ने कल भोजन अवश्य किया होगा।
6. हेतुहेतुमद् भूत— इसमें यह पता चलता है कि भूतकाल में काम का होना सम्भव था, पर वह किसी कारण से न हो सका। जैसे- यदि मैं आगरा जाता तो ताजमहल देखता। यदि पानी बरसता तो अन्न पैदा होता ।
2. वर्तमान काल
क्रिया के जिस रूप से चल रहे समय का पता चले, उसे वर्तमान काल कहते हैं।
इसके तीन भेद हैं—
1. सामान्य वर्तमान, 2. अपूर्ण वर्तमान, 3. संदिध वर्तमान
1. सामान्य वर्तमान— इसमें साधारणतया वर्तमान में क्रिया का होना पाया जाता है; जैसे— वह खाता है, राम पढ़ता है।
2. अपूर्ण वर्तमान— इसमें क्रिया – व्यापार चलता रहता है, समाप्त नहीं होता; जैसे— मैं खाना खा रहा हूं, वह पढ़ रहा है।
3. संदिग्ध वर्तमान— इसमें वर्तमान काल की क्रिया में सन्देह पाया जाता है, जैसे— वह भोजन करता होगा।
3. भविष्यत् काल
क्रिया के जिस रूप से आगे वाले समय का बोध होता हो, उसे भविष्यत् काल कहते हैं।
इसके दो भेद होते हैं—
1. सामान्य भविष्यत् 2.संभाव्य भविष्यत्
1. सामान्य भविष्यत्— इसमें क्रिया का साधारणतया आने वाले समय में होना पाया जाता है; जैसे- राम कल जायेगा।
2. संभाव्य भविष्यत्इ— समें भविष्य काल में क्रिया के होने की संभावना होती है जैसे- सम्भव है मैं आगरा से कानपुर जाऊं।
क्रियाओं के कुछ विशेष प्रयोग
1. पूर्वकालिक क्रिया— जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त करके उसी समय दूसरी क्रिया में लग जाता है तो पहली क्रिया को ‘पूर्वकालिक क्रिया’ कहते हैं; जैसे- भीम ने दुःशासन को ‘मार कर’ आनन्द मनाया ।
2. तात्कालिक क्रिया— इसमें मुख्य धातु के साथ ‘ते ही’ प्रत्यय लगाया जाता है। इस क्रिया की समाप्ति के तुरन्त बाद दूसरी क्रिया प्रारम्भ हो जाती है; जैसे- आप यहां आते ही’ जाने लगे। वह ‘खाते ही’ सो गया ।
3. अपूर्ण क्रिया— इसमें मुख्य क्रिया के साथ होने वाले काम की अपूर्णता पाई जाती है, जैसे- मैंने राम को घर ‘जाते’ देखा ।
क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष
क्रिया के दो लिंग (स्त्री और पुरुष), दो वचन ( एक और बहु वचन) और तीन पुरुष (प्रथम, मध्यम और उत्तम) होते हैं ।
उदाहरण—
स्त्री और पुरुष लिंग— वह स्त्री जाती है, वह पुरुष जाता है।
एक और बहु वचन— एक लड़का जाता है, वह लड़के जाते हैं।
तीन पुरुष— वह जाता है, तू जाता है, मैं जाता हूं।
रंजक क्रियाएं एवं अनेक उदाहरण— जो सहायक क्रियाएं मूल क्रिया में विशेष रंग भर दें अर्थात् विशेषता ला दें, उन्हें रंजक क्रियाएं कहते हैं ।
उदाहरण—
उठना— आकस्मिकता – मुर्दा जी उठा ।
चाहना— पूर्णता – पांच बजना चाहते हैं ।
चुकना— समाप्ति- मैं खा चुका हूं।
निरंतरता— गीता अब भी रोए जाती है।
डालना— सम्पूर्णता- मैंने आपका काम कर डाला।
विशेषण या विशेष्य-पद-युक्त संयुक्त क्रिया— विशेषण या विशेष्य पद के साथ कर (ना) हो (ना) आदि धातुओं के योग से जो क्रियाएं बनती हैं, उन्हें विशेषण-पद-युक्त या विशेष्य-पद-युक्त क्रियाएं कहते हैं। जैसे- स्वीकार करना, याद करना, धोखा खाना, ठोकर खाना, विदा करना आदि प्रयोग के अनुसार संयुक्त क्रियाएं हैं।